Krishna Janmashtami 2026 Kab Hai? जानें जन्माष्टमी की तिथि, शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, व्रत और संपूर्ण जानकारी





श्रीकृष्ण जन्माष्टमी हिंदू धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। इस दिन भगवान श्रीकृष्ण के बाल स्वरूप, लड्डू गोपाल की पूजा की जाती है। भक्त दिनभर व्रत रखते हैं और रात में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के समय विशेष पूजा, अभिषेक, आरती और भजन-कीर्तन करते हैं।


अगर आप भी जानना चाहते हैं कि Krishna Janmashtami 2026 कब है, पूजा का शुभ मुहूर्त क्या है, व्रत कैसे रखें और जन्माष्टमी की पूजा विधि क्या है, तो इस लेख को पूरा पढ़ें।


श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2026 कब है?




वर्ष 2026 में श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का मुख्य पर्व शुक्रवार, 4 सितंबर 2026 को मनाया जाएगा।


कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि 4 सितंबर को सुबह लगभग 2:25 बजे शुरू होगी और 5 सितंबर को रात लगभग 12:13 बजे समाप्त होगी। इसी कारण जन्माष्टमी की मध्यरात्रि पूजा 4 सितंबर की रात से 5 सितंबर की शुरुआत तक चलेगी।


कुछ वैष्णव परंपराओं और ISKCON में जन्माष्टमी का पालन 5 सितंबर को किया जा सकता है। इसलिए अपने स्थानीय मंदिर या पंचांग की परंपरा को भी ध्यान में रखें।


Janmashtami 2026 की महत्वपूर्ण तिथियां



- जन्माष्टमी: शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

- अष्टमी तिथि प्रारंभ: 4 सितंबर, सुबह 2:25 बजे

- अष्टमी तिथि समाप्त: 5 सितंबर, रात 12:13 बजे

- श्रीकृष्ण जन्म पूजा: 4 सितंबर की मध्यरात्रि

- दही-हांडी: 5 सितंबर 2026


अलग-अलग शहरों और पंचांग पद्धतियों के अनुसार पूजा के समय में कुछ मिनटों का अंतर हो सकता है।


जन्माष्टमी 2026 निशीथ काल पूजा मुहूर्त


भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ था। इसलिए जन्माष्टमी पर निशीथ काल को विशेष महत्व दिया जाता है।


नई दिल्ली के लिए 2026 में निशीथ पूजा का समय लगभग:


11:57 PM, 4 सितंबर से

12:43 AM, 5 सितंबर तक


अन्य शहरों में समय अलग रहेगा।


उदाहरण के लिए:



- मुंबई: लगभग 12:14 AM से 1:01 AM

- पुणे: लगभग 12:10 AM से 12:57 AM

- बेंगलुरु: लगभग 11:55 PM से 12:42 AM

- हैदराबाद: लगभग 11:52 PM से 12:38 AM

- चेन्नई: लगभग 11:45 PM से 12:31 AM


अपने शहर के लिए स्थानीय पंचांग का समय देखना बेहतर रहेगा।


जन्माष्टमी पर भगवान श्रीकृष्ण का जन्म क्यों मनाया जाता है?


धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण का जन्म मथुरा में देवकी और वासुदेव के पुत्र के रूप में हुआ था।


कंस को भविष्यवाणी मिली थी कि देवकी का आठवां पुत्र उसका अंत करेगा। इसी डर से उसने देवकी और वासुदेव को कारागार में बंद कर दिया।


जब श्रीकृष्ण का जन्म मध्यरात्रि में हुआ, तब वासुदेव उन्हें यमुना पार करके गोकुल ले गए। वहां नंद बाबा और माता यशोदा ने उनका पालन-पोषण किया।


इसी दिव्य जन्म की स्मृति में हर वर्ष जन्माष्टमी का पर्व मनाया जाता है।


जन्माष्टमी की पूजा विधि


जन्माष्टमी के दिन भक्त सुबह स्नान करके भगवान श्रीकृष्ण का ध्यान करते हैं।


पूजा के लिए यह विधि अपनाई जा सकती है:


1. पूजा स्थान और घर की अच्छी तरह सफाई करें।

2. स्नान करके स्वच्छ कपड़े पहनें।

3. लड्डू गोपाल को सुंदर वस्त्र पहनाएं।

4. भगवान श्रीकृष्ण को झूले में विराजमान करें।

5. पूजा स्थान को फूलों और दीपक से सजाएं।

6. पंचामृत तैयार करें।

7. मध्यरात्रि में लड्डू गोपाल का पंचामृत से अभिषेक करें।

8. भगवान को नए वस्त्र और आभूषण पहनाएं।

9. चंदन, फूल और तुलसी दल अर्पित करें।

10. माखन-मिश्री, फल और मिठाई का भोग लगाएं।

11. श्रीकृष्ण जन्म की कथा और मंत्रों का पाठ करें।

12. मध्यरात्रि में घंटी और शंख बजाकर जन्मोत्सव मनाएं।

13. भगवान श्रीकृष्ण की आरती करें।

14. प्रसाद सभी भक्तों में बांटें।


जन्माष्टमी पूजा में किन चीजों की आवश्यकता होती है?



आप पूजा के लिए अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार सामग्री रख सकते हैं।


मुख्य सामग्री:


- लड्डू गोपाल की मूर्ति

- पंचामृत

- दूध

- दही

- घी

- शहद

- मिश्री या चीनी

- तुलसी दल

- चंदन

- फूल और माला

- धूप और दीपक

- माखन-मिश्री

- फल

- मिठाई

- नए वस्त्र

- मुकुट और बांसुरी

- छोटा झूला


जन्माष्टमी का व्रत कैसे रखें?


जन्माष्टमी पर कई भक्त दिनभर उपवास रखते हैं और मध्यरात्रि में भगवान श्रीकृष्ण के जन्म के बाद व्रत खोलते हैं।


व्रत की पद्धति परिवार और धार्मिक परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।


कुछ भक्त निर्जला व्रत रखते हैं, जबकि कई भक्त फलाहार करते हैं।


फलाहार में फल, दूध, दही, मखाना, साबूदाना, सिंघाड़े का आटा और व्रत में स्वीकार किए जाने वाले अन्य सात्त्विक पदार्थ लिए जाते हैं।


व्रत रखने से पहले अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य का ध्यान रखें।


जन्माष्टमी व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए?



सामान्य रूप से व्रत में अनाज और दालों से परहेज किया जाता है।


व्रत की परंपरा के अनुसार इनसे बचा जाता है:


- गेहूं

- चावल

- दाल

- सामान्य नमक

- अनाज से बने खाद्य पदार्थ


व्रत के नियम अलग-अलग परिवारों और संप्रदायों में अलग हो सकते हैं। इसलिए अपनी परंपरा के अनुसार व्रत रखें।


जन्माष्टमी पर लड्डू गोपाल की पूजा



जन्माष्टमी पर बाल कृष्ण यानी लड्डू गोपाल की पूजा का विशेष महत्व है।


भक्त लड्डू गोपाल को नए वस्त्र पहनाते हैं। उनका श्रृंगार करते हैं। मुकुट, बांसुरी और फूलों से सजाते हैं।


रात में भगवान को झूले में बैठाकर जन्मोत्सव मनाया जाता है।


माखन-मिश्री का भोग लगाया जाता है और तुलसी दल अर्पित किया जाता है।


जन्माष्टमी पर क्या करें?



इस दिन भक्त धार्मिक और सात्त्विक गतिविधियों में समय बिताते हैं।


आप:

- श्रीकृष्ण नाम का जाप करें।

- भगवद्गीता का पाठ करें।

- श्रीकृष्ण जन्म कथा सुनें।

- भजन और कीर्तन करें।

- मंदिर जाएं।

- लड्डू गोपाल का श्रृंगार करें।

- घर में कृष्ण झांकी सजाएं।

- जरूरतमंद लोगों को भोजन या दान दें।

- मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाएं।


जन्माष्टमी पर दही-हांडी कब है?


जन्माष्टमी के अगले दिन दही-हांडी उत्सव मनाने की परंपरा कई क्षेत्रों में है।


2026 में दही-हांडी 5 सितंबर को मनाई जाएगी।


महाराष्ट्र में दही-हांडी का उत्सव विशेष रूप से लोकप्रिय है। इसमें गोविंदा की टोलियां मानव पिरामिड बनाकर ऊंचाई पर लटकी दही की हांडी फोड़ती हैं।


जन्माष्टमी का धार्मिक महत्व 



श्रीकृष्ण को धर्म, प्रेम, करुणा, ज्ञान और कर्म का संदेश देने वाला भगवान माना जाता है।


भगवद्गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कर्म, धर्म और जीवन के बारे में महत्वपूर्ण उपदेश दिए।


जन्माष्टमी का संदेश भक्तों को धर्म के मार्ग पर चलने, अच्छे कर्म करने और भगवान के प्रति श्रद्धा रखने की प्रेरणा देता है।


जन्माष्टमी पर कौन सा मंत्र बोलें?



आप भगवान श्रीकृष्ण के नाम का जाप कर सकते हैं।


“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”
 'कृं कृष्णाय नमः'

इसके अलावा:


“हरे कृष्ण हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण हरे हरे

हरे राम हरे राम, राम राम हरे हरे”



का जाप भी भक्तिभाव से किया जाता है।


जन्माष्टमी 2026 पर विशेष ध्यान रखें 



2026 में 4 और 5 सितंबर को लेकर भ्रम इसलिए दिखाई देता है क्योंकि अष्टमी तिथि 4 सितंबर से शुरू होकर 5 सितंबर की शुरुआत तक रहती है और मध्यरात्रि की पूजा भी तारीख बदलने के समय होती है।


मुख्य जन्माष्टमी 4 सितंबर को है। हालांकि वैष्णव और कुछ अन्य धार्मिक परंपराओं में 5 सितंबर का पालन किया जा सकता है।


इसलिए अपने क्षेत्र के पंचांग और मंदिर की परंपरा के अनुसार अंतिम निर्णय लें।


अक्सर पूछे जाने वाले सवाल


जन्माष्टमी 2026 कब है?


श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2026 में मुख्य रूप से शुक्रवार, 4 सितंबर को मनाई जाएगी।


जन्माष्टमी की रात पूजा कब करें?


मध्यरात्रि के निशीथ काल में श्रीकृष्ण जन्म पूजा की जाती है। सटीक समय आपके शहर के अनुसार अलग होगा।


जन्माष्टमी पर व्रत कब खोलें?


व्रत खोलने का समय परंपरा के अनुसार अलग हो सकता है। कई भक्त मध्यरात्रि पूजा के बाद व्रत खोलते हैं, जबकि कुछ परंपराओं में अगले दिन सूर्योदय के बाद पारण किया जाता है।


जन्माष्टमी पर क्या भोग लगाएं?


माखन-मिश्री, फल, मिठाई, पंचामृत और अन्य सात्त्विक पदार्थ भगवान श्रीकृष्ण को अर्पित किए जाते हैं।


दही-हांडी 2026 में कब है?


दही-हांडी 5 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी।


निष्कर्ष


श्रीकृष्ण जन्माष्टमी 2026 भक्तों के लिए भगवान श्रीकृष्ण की भक्ति और जन्मोत्सव मनाने का विशेष अवसर है। 4 सितंबर को व्रत, पूजा, भजन और मध्यरात्रि में श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाया जाएगा।


इस पावन अवसर पर घर में लड्डू गोपाल की पूजा करें, श्रीकृष्ण नाम का जाप करें और परिवार के साथ भक्तिभाव से जन्माष्टमी मनाएं।



ॐ नमो भगवते वासुदेवाय'  'कृं कृष्णाय नमः'.
जय श्री कृष्ण!

राधे राधे! 🙏🦚


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गोकुल अष्टमी (कृष्ण जन्माष्टमी): भगवान श्री कृष्ण का जन्मदिवस, कथा, महत्व और पूजा विधि

 



जय श्री कृष्ण! 🙏

गोकुल अष्टमी, जिसे कृष्ण जन्माष्टमी और श्री कृष्ण जन्माष्टमी के नाम से भी जाना जाता है, भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व है। भगवान श्री कृष्ण को हिंदू धर्म की परंपरा में भगवान विष्णु का अवतार माना जाता है। जन्माष्टमी का पर्व श्रद्धा, भक्ति, प्रेम और धर्म की भावना से मनाया जाता है।

इस दिन भक्त भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा करते हैं, व्रत रखते हैं, भजन-कीर्तन करते हैं और मध्यरात्रि में भगवान के जन्म का उत्सव मनाते हैं।

आइए जानते हैं गोकुल अष्टमी यानी कृष्ण जन्माष्टमी का महत्व, श्री कृष्ण की जन्म कथा, पूजा विधि, व्रत और इस पर्व से जुड़ी प्रमुख धार्मिक परंपराओं के बारे में।

गोकुल अष्टमी क्या है?

गोकुल अष्टमी भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव से जुड़ा प्रमुख धार्मिक पर्व है। इसे भारत के विभिन्न क्षेत्रों में अलग-अलग नामों और स्थानीय परंपराओं के साथ मनाया जाता है।

उत्तर भारत में इसे सामान्यतः कृष्ण जन्माष्टमी या जन्माष्टमी कहा जाता है, जबकि कुछ क्षेत्रों में गोकुल अष्टमी नाम भी प्रचलित है।

यह पर्व भगवान श्री कृष्ण की बाल लीलाओं, उनकी भक्ति, प्रेम और धर्म के संदेश की याद दिलाता है।

कृष्ण जन्माष्टमी क्यों मनाई जाती है?

धार्मिक परंपरा के अनुसार, भगवान श्री कृष्ण का जन्म अत्याचार और अधर्म के बढ़ते प्रभाव को समाप्त करने तथा धर्म की स्थापना के लिए हुआ।

श्री कृष्ण का जन्म मथुरा में देवकी और वसुदेव के पुत्र के रूप में हुआ था। उनके मामा कंस को आकाशवाणी से यह ज्ञात हुआ था कि देवकी का आठवाँ पुत्र उसके अंत का कारण बनेगा।

इसी कारण कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया।

जब भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ, तब वसुदेव उन्हें लेकर गोकुल पहुँचे और नंद बाबा तथा माता यशोदा के संरक्षण में उन्हें सौंप दिया।

इसी कारण श्री कृष्ण के जीवन में मथुरा और गोकुल दोनों का विशेष धार्मिक और सांस्कृतिक महत्व माना जाता है।

भगवान श्री कृष्ण की जन्म कथा

पौराणिक परंपरा के अनुसार, मथुरा के राजा उग्रसेन के पुत्र कंस ने अपने पिता को पद से हटाकर स्वयं राज्य संभाल लिया था।

कंस की बहन देवकी का विवाह वसुदेव से हुआ। विवाह के बाद जब कंस देवकी और वसुदेव को उनके घर ले जा रहा था, तब आकाशवाणी हुई कि देवकी की आठवीं संतान कंस के विनाश का कारण बनेगी।

यह सुनकर कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया।

देवकी की संतानों के जन्म के समय कंस ने अपने भय के कारण उनके साथ अत्याचार किया। अंततः देवकी की आठवीं संतान के रूप में भगवान श्री कृष्ण का जन्म हुआ।

धार्मिक कथा के अनुसार, श्री कृष्ण के जन्म के समय कारागार के बंधन खुल गए और वसुदेव उन्हें लेकर यमुना नदी पार करके गोकुल पहुँचे।

वहाँ उन्होंने बाल कृष्ण को माता यशोदा और नंद बाबा के संरक्षण में छोड़ दिया।

इसी बाल स्वरूप में श्री कृष्ण ने गोकुल और वृंदावन में अनेक बाल लीलाएँ कीं।

श्री कृष्ण के बाल रूप का महत्व

श्री कृष्ण का बाल रूप भक्तों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र है। उन्हें प्रेम से लड्डू गोपाल, बाल गोपाल और कन्हैया जैसे नामों से भी पुकारा जाता है।

जन्माष्टमी के अवसर पर कई भक्त भगवान श्री कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा करते हैं और उन्हें झूले में विराजमान करते हैं।

बाल कृष्ण की लीलाएँ प्रेम, सरलता, आनंद और भक्ति की भावना से जुड़ी हुई हैं।

गोकुल अष्टमी का धार्मिक महत्व

गोकुल अष्टमी केवल भगवान श्री कृष्ण के जन्म का उत्सव नहीं है, बल्कि यह भक्तों को धर्म, प्रेम और भक्ति का संदेश भी देती है।

श्री कृष्ण का जीवन भारतीय धार्मिक और आध्यात्मिक परंपरा में अनेक महत्वपूर्ण शिक्षाओं से जुड़ा हुआ है।

उनका संदेश हमें यह समझने की प्रेरणा देता है कि जीवन में अपने कर्तव्य का पालन करते हुए सत्य, धर्म और सदाचार के मार्ग पर चलना चाहिए।

भगवद्गीता में श्री कृष्ण द्वारा अर्जुन को दिए गए उपदेश भारतीय आध्यात्मिक दर्शन का महत्वपूर्ण हिस्सा माने जाते हैं।

जन्माष्टमी पर भगवान श्री कृष्ण की पूजा विधि

जन्माष्टमी के दिन भक्त अपनी श्रद्धा और परंपरा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण की पूजा करते हैं।

एक सामान्य पूजा क्रम इस प्रकार हो सकता है:

1. पूजा स्थान की सफाई

सबसे पहले पूजा स्थान को साफ करके वहाँ भगवान श्री कृष्ण की प्रतिमा या चित्र स्थापित करें।

2. बाल गोपाल को विराजमान करें

यदि घर में बाल गोपाल की प्रतिमा है तो उन्हें साफ करके सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनाएँ।

3. दीपक और धूप जलाएँ

भगवान श्री कृष्ण के सामने दीपक और धूप अर्पित करें।

4. भगवान का स्मरण करें

श्रद्धा से भगवान श्री कृष्ण का ध्यान करें और प्रार्थना करें।

5. पंचामृत या जल से स्नान

अपनी पारिवारिक और धार्मिक परंपरा के अनुसार बाल गोपाल का पंचामृत या जल से अभिषेक किया जा सकता है।

6. वस्त्र और श्रृंगार

भगवान श्री कृष्ण को नए वस्त्र, मुकुट, मोरपंख और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जा सकती है।

7. भोग लगाएँ

माखन-मिश्री, फल, मिठाई और अन्य सात्त्विक प्रसाद अपनी परंपरा के अनुसार अर्पित करें।

8. मंत्र और भजन

भगवान श्री कृष्ण के नाम का स्मरण करें तथा भजन, कीर्तन या उपलब्ध परंपरागत स्तोत्रों का पाठ करें।

9. आरती

पूजा के अंत में भगवान श्री कृष्ण की आरती करें।

जन्माष्टमी व्रत की परंपरा

कई भक्त जन्माष्टमी के दिन व्रत या उपवास रखते हैं। व्रत की विधि और नियम अलग-अलग परिवारों तथा धार्मिक परंपराओं में अलग हो सकते हैं।

कुछ भक्त दिनभर उपवास रखते हैं और रात्रि में भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के बाद प्रसाद ग्रहण करते हैं।

यदि कोई व्यक्ति स्वास्थ्य संबंधी कारणों से उपवास नहीं कर सकता, तो अपनी स्थिति के अनुसार सामान्य भोजन करते हुए भी श्रद्धा और भक्ति से भगवान का स्मरण कर सकता है।

व्रत का उद्देश्य केवल भोजन से परहेज करना नहीं, बल्कि मन को भक्ति और आत्मचिंतन की ओर लगाना भी माना जाता है।

जन्माष्टमी की मध्यरात्रि पूजा

जन्माष्टमी के अवसर पर कई मंदिरों और घरों में मध्यरात्रि के समय विशेष पूजा की जाती है।

भगवान श्री कृष्ण के जन्म का स्मरण करते हुए:

शंख बजाया जाता है

घंटियाँ बजाई जाती हैं

भगवान का अभिषेक किया जाता है

आरती की जाती है

भजन और कीर्तन होते हैं

प्रसाद वितरित किया जाता है

इस अवसर पर भक्त “जय श्री कृष्ण” और “हरे कृष्ण” जैसे नामों का स्मरण करते हैं।

गोकुल और वृंदावन में जन्माष्टमी

गोकुल और वृंदावन का भगवान श्री कृष्ण के बाल और किशोर जीवन से विशेष संबंध माना जाता है।

जन्माष्टमी के अवसर पर इन क्षेत्रों के मंदिरों में विशेष सजावट, पूजा, भजन और धार्मिक कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं।

कृष्ण की बाल लीलाओं और रास परंपरा से जुड़े अनेक धार्मिक स्थल भक्तों के लिए विशेष श्रद्धा के केंद्र हैं।

श्री कृष्ण से मिलने वाली आध्यात्मिक सीख

भगवान श्री कृष्ण के जीवन और उनके उपदेशों से अनेक आध्यात्मिक शिक्षाएँ जुड़ी हुई हैं।

धर्म के मार्ग पर चलना

जीवन में कठिन परिस्थितियाँ आने पर भी अपने कर्तव्य और धर्म का पालन करने की प्रेरणा मिलती है।

कर्म का महत्व

भगवद्गीता में कर्म और कर्तव्य पर विशेष जोर दिया गया है। व्यक्ति को अपने कर्म पर ध्यान देते हुए परिणाम के प्रति अनावश्यक आसक्ति से बचने की शिक्षा दी जाती है।

भक्ति

श्री कृष्ण की भक्ति परंपरा में प्रेम और समर्पण को विशेष स्थान प्राप्त है।

सत्य और धर्म

श्री कृष्ण का जीवन धर्म और अधर्म के संघर्ष से जुड़ी अनेक कथाओं से संबंधित है।

मन की शांति

गीता का संदेश मनुष्य को आत्मचिंतन, संयम और संतुलन की दिशा में प्रेरित करता है।

जन्माष्टमी पर क्या करें?

अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार जन्माष्टमी पर आप:

भगवान श्री कृष्ण का स्मरण करें।

घर के पूजा स्थान की सफाई करें।

बाल गोपाल की पूजा करें।

कृष्ण भजन और कीर्तन करें।

गीता के उपदेशों का अध्ययन करें।

जरूरतमंद व्यक्ति की सहायता करें।

सात्त्विक प्रसाद बनाकर भगवान को अर्पित करें।

परिवार के साथ भगवान श्री कृष्ण की कथा पढ़ें या सुनें।

जन्माष्टमी पर ध्यान रखने योग्य बातें

धार्मिक पर्व श्रद्धा और आनंद का अवसर होते हैं। पूजा करते समय अपनी पारिवारिक और स्थानीय परंपराओं का सम्मान करें।

व्रत रखने वाले व्यक्ति अपनी स्वास्थ्य स्थिति को ध्यान में रखें। बच्चों, बुजुर्गों या स्वास्थ्य संबंधी समस्या वाले लोगों के लिए उपवास के नियम अलग तरीके से अपनाए जा सकते हैं।

धार्मिक मान्यताओं को वैज्ञानिक परिणाम या निश्चित लाभ की गारंटी के रूप में प्रस्तुत नहीं करना चाहिए।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

गोकुल अष्टमी और जन्माष्टमी क्या एक ही हैं?

गोकुल अष्टमी और कृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव से संबंधित नाम हैं। अलग-अलग क्षेत्रों में इस पर्व के नाम और मनाने की परंपराएँ अलग हो सकती हैं।

जन्माष्टमी किस भगवान का जन्मदिवस है?

जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव के रूप में मनाई जाती है।

भगवान श्री कृष्ण के माता-पिता कौन थे?

धार्मिक परंपरा के अनुसार भगवान श्री कृष्ण के माता-पिता देवकी और वसुदेव थे। उनके पालन-पोषण में नंद बाबा और माता यशोदा की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

श्री कृष्ण का जन्म कहाँ हुआ था?

धार्मिक परंपरा के अनुसार श्री कृष्ण का जन्म मथुरा में हुआ था।

जन्माष्टमी पर बाल गोपाल की पूजा क्यों की जाती है?

श्री कृष्ण के बाल स्वरूप की पूजा उनकी बाल लीलाओं और भक्तों के प्रेम एवं वात्सल्य की परंपरा से जुड़ी हुई है।

जन्माष्टमी पर व्रत रखना जरूरी है?

व्रत रखना व्यक्तिगत श्रद्धा और पारिवारिक या धार्मिक परंपरा पर निर्भर करता है। स्वास्थ्य की स्थिति को भी ध्यान में रखना चाहिए।

निष्कर्ष

गोकुल अष्टमी यानी कृष्ण जन्माष्टमी भगवान श्री कृष्ण के जन्मोत्सव का पावन पर्व है। यह पर्व हमें भगवान श्री कृष्ण के जीवन, उनकी बाल लीलाओं, भक्ति और भगवद्गीता के आध्यात्मिक संदेश को याद करने का अवसर देता है।

जन्माष्टमी के दिन भगवान श्री कृष्ण का स्मरण करते हुए यदि हम उनके जीवन से प्रेम, भक्ति, कर्तव्य, सत्य और धर्म की प्रेरणा अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करें, तो यही इस पर्व की सुंदर आध्यात्मिक भावना हो सकती है।

जय श्री कृष्ण! 🙏
राधे राधे! 🌺

मेरी आस्था मेरा गर्व जय श्री राम


भी 'राम नाम की कृपा' है, जीवन के तमाम उतार-चढ़ाव भी 'होइए वही जो राम रचि राखा' है और मृत्युकाल में भी 'राम नाम सत्य है' का पटाक्षेप है !

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Mangalwar Ke 5 Upay: मंगलवार के 5 उपाय,



 हनुमान जी करेंगे हर परेशानी दूर 
मंगलवार के दिन भगवान श्रीराम के परभक्त हनुमान जी की पूजा करने का विधान है। इस दिन पूजा करने के साथ ज्योतिष संबंधी कुछ उपाय करने से मंगल दोष से मुक्ति मिल जाती है। जानिए मंगलवार को करें कौन से उपाय

पंचांग के अनुसार, सप्ताह का हर एक दिन किसी न किसी देवी-देवता और ग्रह को समर्पित होता है। इसी तरह मंगलवार का दिन भगवान हनुमान और ग्रहों के सेनापति मंगल ग्रह को समर्पित है। ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मंगल ग्रह को उग्र माना जाता है। यह गृह कलह, कष्ट, दुर्घटना आदि का कारण होता है। इतना ही नहीं जिन लोगों की कुंडली में मंगल की स्थिति मजबूत नहीं होती है उन्हें दिमाग, खून संबंधी बीमारियों का सामना करना पड़ता है। इसलिए जरूरी है कि मंगल की स्थिति को मजबूत बनाया जाए। ज्योतिष शास्त्र में मंगल की स्थिति को ठीक करने के कुछ उपाय बताए गए हैं, जिन्हें करते व्यक्ति खुशहाली के साथ रह सकता है। इसके साथ ही हनुमान जी का भी आशीर्वाद मिलेगा।

CONTINUE






मंगल के उपाय
हनुमान जी के सामने जलाएं दीपक
हर मंगलवार के दिन सुबह और शाम के समय भगवान हनुमान के सामने घी का दीपक जलाएं। बस इस बात का ध्यान रखें कि इसमें रुई नहीं बल्कि कलावा से बनी बाती का इस्तेमाल करें। अगर कलावा नहीं है, तो बाती में थोड़ा सा सिंदूर डालकर लाल कर लें।

भगवान हनुमान को लगाएं ये भोग
मंगलवार के दिन भगवान हनुमान को बूंदी के लड्डू का भोग लगाएं। अगर बूंदी के लड्डू संभव नहीं है, तो चने की दाल का गुड़ से भोग लगाएं।


चढ़ाएं चमेली का तेल

हनुमान जी को चमेली के तेल में सिंदूर मिलाकर लेप लगाएं। हर मंगलवार के दिन ऐसा करने से मंगल दोष के साथ शनि दोष से भी मुक्ति मिल जाएगी।

भगवान हनुमान को चढ़ाएं तुलसी की माला
भगवान हनुमान जी को 108 तुलसी के पत्तों पर राम नाम लिखकर पहनाएं। ऐसा करने से भगवान हनुमान जल्द प्रसन्न होते हैं। इसके साथ ही मंगल दोष और शनि दोष से भी मुक्ति मिलती है।

मंगलवार के दिन बंदरों या लाल रंग की गायों को भुने चने और गुड़ खिलाएं। ऐसा करने से मंगल की स्थिति सही हो जाएगी।

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..दिवाळी पाडवा.--- दाम्पती जीवनातील आदर, कृतज्ञतेचा संगम


https://shribhakt.blogspot.com

   

 आज दिवाळी पाडवा आहे. यालाच बलीप्रतिपदा असेही म्हणतात.
    पौराणिक कथेत प्रतिपदेच्या दिवशी महाप्रतापी आणि दानशूर राजा बळी यावर विजय प्राप्त करुन विष्णू जेव्हा वैकुंठात गेले तेव्हा लक्ष्मीने त्यांचे औक्षण करुन स्वागत केले.तसेच याच दिवशी पार्वतीने शंकराला द्युत या खेळात हरविले. म्हणून या दिवसाला द्युत पाडवा असेही म्हणतात
असा उल्लेख आहे.


         *बदलत्या काळात जुन्या प्रथा परंपरांचा नव्याने  अन्वयार्थ समजून घेतला तर आपल्या प्रत्येक पंरपरेत - रुढीत एक कौटुंबिक व सामाजिक आनंद निर्मिती
दडली आहे असे आपल्याला नक्कीच वाटेल.


       दिवाळी पाडव्याचा  जो संदर्भ दिला आहे त्याकडे आपण जरा वेगळ्या दृष्टिकोनातून पाहिले तर आपणास  लक्षात येईल की पती पत्नीच्या एकमेकां विषयींच्या आदर भावना व्यक्त करण्यासाठी या प्रथा होत्या.


   विजयी होवून येणाऱ्या पती विष्णूला त्याची पत्नी आदराने ओवाळते, त्याचा आदर सन्मान करते आणि विष्णू प्रसन्न होवून पत्नीला महालक्ष्मी संबोधतो, ही परंपरा आजच्या धकाकीच्या जीवनात पती-पत्नीतील आदर आणि परस्परांवरी विश्वास व्यक्त करण्यास पुरेशी आहे.


 सहजीवनास प्रारंभ करताना दाम्पत्य एकमेकासाठी अनोळखी असतात. सहजीवन विस्तारते तसे एकमेकांना ते ओळखू लागतात. ओळखीतून विश्वास निर्माण होतो. विश्वास हा परस्परांवरील प्रेमात रुपांतरीत होतो. विश्वासाची अंतिम अवस्था परस्परांवरील आदरात असते. पती-पत्नीतील सुखाची किंवा समर्पणाची समाधिस्थ अवस्था ही परस्पराप्रति आदराची असते. हा आदर सहजीवनाच्या प्रारंभी कधीच नसतो. तेव्हा असते केवळ आकर्षण आणि शरीराचे समर्पण.


      दिवाळी पाडव्याला पत्नी विश्वास आणि आदराने पतीला ओवाळते. आयुष्यातील लहान मोठ्या अडचणी किंवा समस्यांवर विजय मिळविल्याचा त्यात आनंद असतो. अशी पत्नी लक्ष्मी रुपात असते. कधीकधी पत्नी सुध्दा पती सोबत नियतीच्या संघर्षावर मात करते. अशी पत्नी पार्वती रुपात असते. म्हणूनच दिवाळीच्या पाडव्याला परस्परांप्रति असलेला आदर व्यक्त करण्यासाठी औक्षणाची करण्याची प्रथा अस्तित्वात आली.


    दिवाळी पाडव्याच्या औक्षणानंतर पती-पत्नीस सस्नेह भेट देतो. अशी भेट देणे म्हणजे नात्यांची गुंफण अधिक घट्ट करणे होय. दिवाळी पाडव्याचा हा भावार्थ दाम्पती जीवनाला प्रगल्भ व समृध्द करणारा आहे असे मला वाटते.


सर्व मित्र परिवार व हितचिंतकांना दिवाळी पाडव्याच्या मनःपूर्वक  शुभेच्छा !!