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सर्वपितृ अमावस्या 2026: श्राद्ध और तर्पण विधि, पूजा सामग्री, मंत्र एवं दान का महत्व

सर्वपितृ अमावस्या 2026: श्राद्ध और तर्पण विधि, पूजा सामग्री, मंत्र एवं दान का महत्व

🙏 सर्वपितृ अमावस्या 2026 🙏

पूर्वजों के स्मरण, श्रद्धा और सम्मान का पावन दिन

📅 शनिवार, 10 अक्टूबर 2026

🪔 श्राद्ध • तर्पण • पिंडदान • दान-पुण्य

ॐ पितृभ्यः नमः।

हिंदू धर्म में सर्वपितृ अमावस्या का विशेष धार्मिक महत्व माना जाता है। इसे महालय अमावस्या तथा पितृ पक्ष की अमावस्या भी कहा जाता है। यह दिन अपने दिवंगत माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी तथा अन्य पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करने और उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है।

पितृ पक्ष के अंतिम दिन परिवार के लोग अपने पूर्वजों की स्मृति में श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान, प्रार्थना और जरूरतमंदों को भोजन या अन्य उपयोगी वस्तुएँ दान करते हैं। धार्मिक मान्यता के अनुसार, इस दिन उन पूर्वजों के लिए भी श्राद्ध किया जा सकता है जिनकी मृत्यु की तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध किसी कारणवश निर्धारित तिथि पर नहीं हो पाया।

महत्वपूर्ण जानकारी: सर्वपितृ अमावस्या 10 अक्टूबर 2026, शनिवार को है। श्राद्ध के लिए कुतुप मुहूर्त और अपराह्न काल को परंपरागत रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। मुहूर्त शहर के अनुसार बदलता है, इसलिए अपने स्थानीय पंचांग से समय की पुष्टि करें।

1. सर्वपितृ अमावस्या का धार्मिक महत्व

पितृ पक्ष हिंदू परंपरा में पूर्वजों के प्रति सम्मान और कृतज्ञता व्यक्त करने का समय है। इस अवधि में परिवार अपने दिवंगत परिजनों को याद करते हैं तथा अपनी परंपरा के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करते हैं।

सर्वपितृ अमावस्या को विशेष रूप से उन पूर्वजों के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है जिनकी मृत्यु तिथि परिवार को मालूम नहीं है या जिनका श्राद्ध निर्धारित तिथि पर नहीं हो सका। कुछ परंपराओं में अमावस्या, पूर्णिमा और चतुर्दशी तिथि पर दिवंगत हुए परिजनों के लिए भी इस दिन श्राद्ध किया जाता है।

इस दिन का मूल संदेश है कि हम अपने पूर्वजों के योगदान को याद करें, परिवार की अच्छी परंपराओं को आगे बढ़ाएँ और जरूरतमंदों की सहायता करें। धार्मिक मान्यताएँ अलग-अलग परिवारों और क्षेत्रों में भिन्न हो सकती हैं।

2. श्राद्ध और तर्पण के लिए आवश्यक सामग्री

अपनी पारिवारिक परंपरा और पूजा कराने वाले पुरोहित के निर्देश के अनुसार निम्न सामग्री तैयार रख सकते हैं:

  • स्वच्छ जल और तांबे या अन्य साफ पात्र में रखा पानी।
  • काले तिल तथा कुशा, यदि आपकी परंपरा में उपयोग किए जाते हों।
  • साफ थाली, आसन और स्वच्छ वस्त्र।
  • पुष्प, अक्षत और चंदन।
  • दीपक, रुई की बत्ती और घी या तेल।
  • पितरों के निमित्त तैयार किया जाने वाला सात्त्विक भोजन।
  • पिंडदान की परंपरा होने पर चावल या आटे से बने पिंड तथा अन्य आवश्यक सामग्री।
  • अन्न, फल, वस्त्र या दान के लिए अपनी क्षमता के अनुसार उपयोगी वस्तुएँ।
ध्यान दें: सभी सामग्री हर परिवार के लिए अनिवार्य नहीं होती। श्राद्ध की विधि, पिंड की सामग्री, कुशा का प्रयोग और संकल्प की प्रक्रिया क्षेत्रीय तथा पारिवारिक परंपराओं के अनुसार बदल सकती है।

3. सर्वपितृ अमावस्या पर पूजा की तैयारी

चरण 1: स्नान और स्वच्छता

सुबह उठकर स्नान करें और साफ वस्त्र धारण करें। पूजा का स्थान स्वच्छ रखें। मन को शांत रखते हुए अपने दिवंगत परिजनों का स्मरण करें।

चरण 2: पूर्वजों का स्मरण

अपने माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी तथा अन्य दिवंगत परिजनों को श्रद्धापूर्वक याद करें। यदि आप उनका नाम और गोत्र जानते हैं तो पारंपरिक संकल्प में उनका उल्लेख किया जा सकता है। संकल्प की सही विधि के लिए जानकार पुरोहित का मार्गदर्शन लें।

चरण 3: पूजा का स्थान तैयार करें

एक साफ स्थान पर जल, तिल, पुष्प और अन्य आवश्यक सामग्री रखें। दीपक सुरक्षित स्थान पर जलाएँ। यदि घर में श्राद्ध कर रहे हैं तो अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार भोजन तथा अन्य अर्पण की तैयारी करें।

4. सर्वपितृ अमावस्या पर तर्पण की विधि

तर्पण का अर्थ है श्रद्धापूर्वक जल अर्पित करना। पितृ पक्ष में जल अर्पण को पूर्वजों के प्रति सम्मान और स्मरण का प्रतीक माना जाता है। पारंपरिक पितृ तर्पण में जल के साथ काले तिल और कुशा का प्रयोग भी किया जाता है।

तर्पण करने की सामान्य प्रक्रिया

  1. स्वच्छता रखें: स्नान के बाद साफ वस्त्र पहनें और शांत स्थान पर बैठें।
  2. जल तैयार करें: एक साफ पात्र में स्वच्छ जल लें। अपनी परंपरा के अनुसार थोड़े काले तिल और कुशा रखें।
  3. संकल्प करें: मन में अपने पूर्वजों का स्मरण करते हुए उनके प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता व्यक्त करें। विस्तृत वैदिक संकल्प पुरोहित से सीखें।
  4. जल अर्पित करें: अपने परिवार की परंपरा के अनुसार जल अर्पित करें। पारंपरिक तर्पण में हाथ की विशेष मुद्रा, दिशा और क्रम का महत्व हो सकता है; इसलिए विधिवत तर्पण पुरोहित के मार्गदर्शन में करना उचित है।
  5. मंत्र या प्रार्थना करें: पितरों के सम्मान में प्रार्थना करें और परिवार की शांति, सद्भाव तथा सद्बुद्धि की कामना करें।
  6. समापन करें: तर्पण के बाद हाथ जोड़कर पूर्वजों का स्मरण करें। जल को स्वच्छ और उपयुक्त स्थान पर ही प्रवाहित करें। जलस्रोतों में प्लास्टिक, पूजा सामग्री या अन्य कचरा न डालें।
ॐ पितृभ्यः नमः।
ॐ सर्वेभ्यः पितृभ्यः नमः।

इन सरल प्रार्थनाओं का अर्थ है—पितरों को नमन और सभी पूर्वजों के प्रति श्रद्धापूर्वक प्रणाम। ये सामान्य प्रार्थना के रूप में कही जा सकती हैं। विस्तृत वैदिक तर्पण मंत्र, नाम-गोत्र का उच्चारण तथा आचमन आदि की विधि परंपरा के अनुसार पुरोहित से सीखें।

5. श्राद्ध और पिंडदान की विधि

श्राद्ध पूर्वजों की स्मृति में श्रद्धापूर्वक किया जाने वाला धार्मिक कर्म है। पिंडदान कुछ हिंदू परंपराओं में श्राद्ध का महत्वपूर्ण अंग है। दोनों की विधि परिवार, क्षेत्र और कुलाचार के अनुसार भिन्न हो सकती है।

श्राद्ध की सामान्य प्रक्रिया

  1. संकल्प: दिवंगत परिजन का स्मरण करते हुए श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करने का संकल्प लें।
  2. अर्पण: परंपरा के अनुसार जल, तिल, पुष्प तथा अन्य सामग्री अर्पित करें।
  3. भोजन की तैयारी: परिवार की मान्यता के अनुसार सात्त्विक भोजन तैयार करें।
  4. पिंडदान: यदि आपके कुल में पिंडदान की परंपरा है, तो पुरोहित के निर्देशानुसार पिंड तैयार करके विधि पूरी करें।
  5. प्रार्थना: दिवंगत परिजनों को श्रद्धांजलि दें और उनके जीवन से मिली सीख को याद करें।
  6. भोजन और दान: अपनी परंपरा के अनुसार ब्राह्मणों, जरूरतमंदों या अन्य लोगों को भोजन कराएँ तथा सामर्थ्य के अनुसार दान करें।
विशेष सुझाव: यदि आप पहली बार श्राद्ध या पिंडदान कर रहे हैं, तो विधिवत कर्मकांड के लिए किसी योग्य और विश्वसनीय पुरोहित से सहायता लें। सभी परिवारों में एक जैसी प्रक्रिया अनिवार्य नहीं है। श्रद्धा, स्वच्छता और अपनी परंपरा का सम्मान महत्वपूर्ण है।

6. घर पर श्राद्ध करना संभव न हो तो क्या करें?

किसी कारण से विस्तृत श्राद्ध या पिंडदान करना संभव न हो, तो निराश होने की आवश्यकता नहीं है। अपनी धार्मिक मान्यता के अनुसार आप निम्न कार्य कर सकते हैं:

  • पूर्वजों का शांत मन से स्मरण और प्रार्थना करें।
  • स्वच्छ जल अर्पित करें, यदि यह आपकी परंपरा का हिस्सा है।
  • किसी जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन या उपयोगी वस्तु दें।
  • अपने माता-पिता और परिवार के बुजुर्गों का सम्मान करें।
  • पूर्वजों से मिली अच्छी सीख और पारिवारिक मूल्यों को आगे बढ़ाएँ।

7. सर्वपितृ अमावस्या के लिए प्रार्थना और मंत्र

पूजा के समय अपनी श्रद्धा और पारिवारिक परंपरा के अनुसार इन सरल मंत्रों और प्रार्थनाओं का पाठ कर सकते हैं:

ॐ पितृभ्यः नमः।
ॐ सर्वेभ्यः पितृभ्यः नमः।
सर्वे भवन्तु सुखिनः।
सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु।
मा कश्चिद्दुःखभाग्भवेत्॥

इन प्रार्थनाओं के माध्यम से सभी के कल्याण, शांति और सद्भाव की कामना करें। मंत्रों के उच्चारण में संदेह होने पर जानकार पुरोहित या विश्वसनीय धार्मिक ग्रंथ का सहारा लें।

8. सर्वपितृ अमावस्या पर क्या दान करें?

धार्मिक परंपराओं में इस दिन दान-पुण्य को विशेष महत्व दिया जाता है। दान अपनी क्षमता के अनुसार, बिना दिखावे और सम्मानपूर्वक करना चाहिए।

दान या सेवा महत्व
अन्नदान जरूरतमंद लोगों को भोजन उपलब्ध कराना।
वस्त्रदान उपयोगी और स्वच्छ वस्त्र देना।
जल सेवा लोगों और पशु-पक्षियों के लिए स्वच्छ पेयजल की व्यवस्था करना।
फल और खाद्य सामग्री जरूरतमंद परिवारों को सम्मानपूर्वक सहायता देना।
गौसेवा पशुओं को सुरक्षित और उपयुक्त भोजन-पानी उपलब्ध कराने में सहायता करना।
सेवा और सहयोग बुजुर्गों, जरूरतमंदों और असहाय लोगों की मदद करना।

धार्मिक मान्यता है कि श्रद्धापूर्वक किया गया दान पुण्यकारी होता है। दान की मात्रा से अधिक उसका उद्देश्य, सद्भावना और जरूरतमंद व्यक्ति की गरिमा का सम्मान महत्वपूर्ण है।

9. पितरों के निमित्त भोजन और कौआ, गाय आदि को भोजन देना

कई परिवारों में श्राद्ध के अवसर पर भोजन का एक भाग पितरों के निमित्त रखा जाता है। कुछ परंपराओं में कौए, गाय और कुत्ते को भोजन देने की प्रथा भी है। इन कार्यों को पूर्वजों के स्मरण और जीवों के प्रति करुणा के प्रतीक के रूप में देखा जाता है।

  • भोजन ताजा, स्वच्छ और पशु के लिए उपयुक्त होना चाहिए।
  • किसी पशु को जबरन भोजन न खिलाएँ।
  • खाद्य पदार्थ सड़क या ऐसी जगह न रखें जहाँ उनसे दुर्घटना या गंदगी हो सकती हो।
  • यदि पशुओं को भोजन देना संभव न हो, तो जरूरतमंद लोगों की सहायता भी एक अच्छा विकल्प है।

10. सर्वपितृ अमावस्या पर क्या करें और क्या न करें?

क्या करें?

  • पूर्वजों को श्रद्धापूर्वक याद करें।
  • अपनी परंपरा के अनुसार श्राद्ध और तर्पण करें।
  • परिवार के बुजुर्गों का सम्मान करें और उनका आशीर्वाद लें।
  • जरूरतमंदों को भोजन या उपयोगी वस्तुएँ दान करें।
  • पूजा स्थल और आसपास स्वच्छता रखें।
  • धार्मिक कर्मकांड के लिए स्थानीय पंचांग और जानकार पुरोहित से मार्गदर्शन लें।

क्या न करें?

  • धार्मिक अनुष्ठान करते समय जल्दबाजी या दिखावा न करें।
  • दान करने के लिए अपनी आर्थिक क्षमता से अधिक खर्च न करें।
  • किसी को उसकी धार्मिक परंपरा के कारण अपमानित न करें।
  • जलस्रोतों में प्लास्टिक, कचरा या गैर-जैविक पूजा सामग्री न डालें।
  • किसी अनुष्ठान के छूट जाने पर भयभीत न हों; अपनी परंपरा के अनुसार उचित मार्गदर्शन लें।

11. सर्वपितृ अमावस्या और पितृ ऋण का भाव

भारतीय धार्मिक और सांस्कृतिक परंपरा में पितृ ऋण का विचार पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और जिम्मेदारी से जुड़ा है। हमें जो जीवन, संस्कार, पारिवारिक पहचान और अनुभव प्राप्त हुए हैं, उनमें पिछली पीढ़ियों का योगदान रहता है।

इसलिए पितरों का सम्मान केवल एक दिन के अनुष्ठान तक सीमित नहीं होना चाहिए। माता-पिता की सेवा, बुजुर्गों की देखभाल, परिवार में प्रेम बनाए रखना और अच्छे संस्कारों को अगली पीढ़ी तक पहुँचाना भी पूर्वजों के प्रति सम्मान व्यक्त करने के अर्थपूर्ण तरीके हैं।

12. सर्वपितृ अमावस्या 2026: अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

प्रश्न 1: सर्वपितृ अमावस्या 2026 कब है?

उत्तर: सर्वपितृ अमावस्या शनिवार, 10 अक्टूबर 2026 को है।

प्रश्न 2: सर्वपितृ अमावस्या पर श्राद्ध कौन कर सकता है?

उत्तर: श्राद्ध करने वाले व्यक्ति के संबंध में पारिवारिक परंपराएँ और धार्मिक नियम अलग-अलग हो सकते हैं। अपनी कुल परंपरा के अनुसार जानकार पुरोहित से सलाह लें।

प्रश्न 3: यदि पूर्वजों की मृत्यु तिथि ज्ञात न हो तो क्या करें?

उत्तर: परंपरागत मान्यता के अनुसार सर्वपितृ अमावस्या ऐसे पूर्वजों के श्राद्ध के लिए विशेष दिन है जिनकी मृत्यु तिथि ज्ञात नहीं है या जिनका श्राद्ध छूट गया है।

प्रश्न 4: क्या घर पर तर्पण कर सकते हैं?

उत्तर: अनेक परिवार अपनी परंपरा के अनुसार घर पर सरल तर्पण करते हैं। विस्तृत वैदिक विधि, संकल्प और कर्मकांड के लिए पुरोहित से मार्गदर्शन लेना उचित है।

प्रश्न 5: तर्पण के लिए कौन-सी सामग्री आवश्यक है?

उत्तर: सामान्यतः स्वच्छ जल और साफ पात्र का उपयोग किया जाता है। पारंपरिक पितृ तर्पण में काले तिल और कुशा भी उपयोग किए जा सकते हैं। आवश्यक सामग्री कुलाचार के अनुसार बदल सकती है।

प्रश्न 6: सर्वपितृ अमावस्या पर दान करना जरूरी है?

उत्तर: दान-पुण्य को शुभ माना जाता है, लेकिन दान अपनी क्षमता के अनुसार ही करना चाहिए। जरूरतमंद को भोजन, स्वच्छ वस्त्र या उपयोगी वस्तु देना भी सेवा का अच्छा रूप है।

13. सर्वपितृ अमावस्या का आध्यात्मिक संदेश

सर्वपितृ अमावस्या हमें यह याद दिलाती है कि हमारा जीवन केवल हमारे प्रयासों का परिणाम नहीं, बल्कि पिछली पीढ़ियों के अनुभवों, संस्कारों और योगदान से भी जुड़ा हुआ है। पूर्वजों का सम्मान करना, परिवार में प्रेम बनाए रखना और जरूरतमंदों की सहायता करना इस दिन की भावना को सार्थक बनाता है।

🙏 पितृ देवताओं को सादर नमन 🙏

ईश्वर से प्रार्थना है कि सभी दिवंगत पूर्वजों के प्रति हमारी श्रद्धा और कृतज्ञता बनी रहे तथा सभी परिवारों में सुख, शांति, सद्भाव और सेवा की भावना बढ़े।

ॐ शान्तिः शान्तिः शान्तिः।

अस्वीकरण: यह लेख धार्मिक एवं सांस्कृतिक जानकारी के उद्देश्य से तैयार किया गया है। श्राद्ध, तर्पण, पिंडदान और मंत्रों की विधि अलग-अलग क्षेत्रों तथा पारिवारिक परंपराओं में भिन्न हो सकती है। सटीक मुहूर्त और विस्तृत विधि के लिए अपने शहर के पंचांग और योग्य पुरोहित से परामर्श करें।

SHRI BHAKT पर धर्म, व्रत, त्योहार, पंचांग और आध्यात्मिक जानकारी पढ़ते रहें। इस लेख को अपने परिवार और मित्रों के साथ साझा करें। 🙏

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25 सितंबर 2026 गणेश मूर्ति विसर्जन: शुभ मुहूर्त, पूजा विधि, आरती और मंत्र | अनंत चतुर्दशी

 

https://shribhakt.blogspot.com/2026/09/ganesh-visarjan-2026-25-september-muhurat-puja-vidhi-mantra.html

25 सितंबर 2026 को अनंत चतुर्दशी के दिन गणेश मूर्ति विसर्जन का मुख्य पर्व मनाया जाएगा। गणेश चतुर्थी (14 सितंबर 2026) से शुरू हुआ 10-दिवसीय उत्सव अनंत चतुर्दशी पर पूर्ण होता है। इस दिन भक्त बप्पा को ससम्मान विदाई देते हैं और “गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ” का जयघोष करते हैं।

गणेश विसर्जन 2026 तिथि और तिथि समय

  • मुख्य विसर्जन दिन: शुक्रवार, 25 सितंबर 2026
  • अवसर: अनंत चतुर्दशी (भाद्रपद शुक्ल चतुर्दशी)
  • चतुर्दशी तिथि आरंभ: 24 सितंबर 2026 को रात 11:18 बजे
  • चतुर्दशी तिथि समाप्ति: 25 सितंबर 2026 को रात 11:06 बजे

उदया तिथि के अनुसार अनंत चतुर्दशी 25 सितंबर को मनाई जाएगी, इसलिए मुख्य गणेश विसर्जन भी इसी दिन होगा।


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शुभ मुहूर्त 

शहर के अनुसार समय में थोड़ा अंतर हो सकता है। स्थानीय पंचांग अवश्य देखें।

  • प्रातः मुहूर्त (चर, लाभ, अमृत): सुबह 6:11 बजे से 10:42 बजे तक
  • दोपहर मुहूर्त (शुभ): दोपहर 12:13 बजे से 1:43 बजे तक
  • शाम मुहूर्त (चर): शाम 4:44 बजे से 6:14 बजे तक
  • रात मुहूर्त (लाभ): रात 9:14 बजे से 10:43 बजे तक
  • देर रात/तड़के: 26 सितंबर को 12:13 बजे से 4:42 बजे तक

नोट: मुंबई, पुणे, हैदराबाद आदि शहरों में सूर्योदय के अनुसार समय 15-20 मिनट आगे-पीछे हो सकता है।

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गणेश विसर्जन पूजा विधि (स्टेप-बाय-स्टेप)

  1. सुबह स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को साफ करें।
  2. अंतिम पूजा (उत्तर पूजा) करें – चंदन, अक्षत, फूल, दूर्वा, सिंदूर, धूप-दीप अर्पित करें।
  3. मोदक, लड्डू, फल, नारियल का भोग लगाएं।
  4. परिवार के साथ मिलकर आरती करें और क्षमा प्रार्थना करें।
  5. मूर्ति को सजावट हटाकर सावधानी से उठाएं।
  6. जुलूस या घर पर बाल्टी/टब में स्वच्छ पानी में विसर्जन करें।
  7. विसर्जन के समय “गणपति बप्पा मोरया, अगले बरस तू जल्दी आ” का जयघोष करें।
  8. विसर्जन के बाद पानी को पेड़ या पौधे के नीचे डाल दें (इको-फ्रेंडली तरीका)।

घर पर विसर्जन के लिए सुझाव: मिट्टी की मूर्ति और प्राकृतिक रंगों का उपयोग करें। प्लास्टिक या POP मूर्ति से बचें।

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गणेश विसर्जन मंत्र

मुख्य विसर्जन मंत्र:

ॐ यान्तु देवगणाः सर्वे पूजामादाय मामकीम्।
इष्टकामसमृद्ध्यर्थं पुनर्अपि पुनरागमनाय च॥

अर्थ: हे सभी देवगण! मेरी पूजा स्वीकार कर अपने स्थान को प्रस्थान करें और मेरी मनोकामनाओं की सिद्धि हेतु पुनः पधारें।

अन्य मंत्र:

गच्छ गच्छ सुरश्रेष्ठ स्वस्थाने परमेश्वर।
मम पूजा गृहीत्वा पुनरागमनाय च॥

विसर्जन के समय तीन बार मंत्र का जाप करें।

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श्री गणेश आरती

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

एक दंत दयावंत, चार भुजा धारी।
माथे सिंदूर सोहे, मूसे की सवारी॥

पान चढ़े फल चढ़े, और चढ़े मेवा।
लड्डुअन का भोग लगे, संत करें सेवा॥

अंधन को आंख देत, कोढ़िन को काया।
बांझन को पुत्र देत, निर्धन को माया॥

जय गणेश जय गणेश, जय गणेश देवा।
माता जाकी पार्वती, पिता महादेवा॥

महत्वपूर्ण बातें

  • विसर्जन शुभ चौघड़िया में ही करें।
  • मूर्ति को कमर से नीचे न ले जाएं।
  • पर्यावरण का ध्यान रखें – मिट्टी की मूर्ति और घरेलू विसर्जन बेहतर है।
  • अनंत चतुर्दशी पर भगवान विष्णु (अनंत रूप) की भी पूजा और अनंत सूत्र बांधने की परंपरा है।

गणपति बप्पा मोरया!
मंगलमूर्ति मोरया!
अगले बरस तू जल्दी आ!

नोट: मुहूर्त शहर और स्थानीय पंचांग के अनुसार थोड़े भिन्न हो सकते हैं। सटीक समय के लिए अपने शहर का पंचांग अवश्य देखें।

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अजा एकादशी 2026: व्रत तारीख, पारण समय, व्रत कथा, पूजा विधि और फलाहार

 

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अजा एकादशी व्रत 2026: तारीख, व्रत-पारण समय, व्रत कथा, पूजा विधि और फलाहार

अजा एकादशी हिंदू धर्म की महत्वपूर्ण एकादशियों में से एक है। यह भाद्रपद कृष्ण पक्ष की एकादशी तिथि को मनाई जाती है। भगवान श्रीहरि विष्णु को समर्पित इस व्रत में भक्त उपवास रखते हैं, भगवान विष्णु की पूजा करते हैं और अजा एकादशी की व्रत कथा सुनते या पढ़ते हैं।

2026 में दिल्ली के अनुसार अजा एकादशी का व्रत सोमवार, 7 सितंबर 2026 को रखा जाएगा। एकादशी तिथि 6 सितंबर की शाम 7:29 बजे शुरू होकर 7 सितंबर की शाम 5:03 बजे समाप्त होगी। 


अजा एकादशी 2026 कब है?


अजा एकादशी व्रत 7 सितंबर 2026, सोमवार को रखा जाएगा।

एकादशी तिथि प्रारंभ: 6 सितंबर 2026, शाम 7:29 बजे

एकादशी तिथि समाप्त: 7 सितंबर 2026, शाम 5:03 बजे

व्रत का दिन: 7 सितंबर 2026, सोमवार

स्थान: दिल्ली

उदयातिथि के अनुसार 7 सितंबर को ही अजा एकादशी का व्रत रखा जाएगा।


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अजा एकादशी 2026 पारण समय, दिल्ली


अजा एकादशी का व्रत अगले दिन द्वादशी तिथि में सूर्योदय के बाद पारण करके समाप्त किया जाता है।

दिल्ली के लिए 8 सितंबर 2026, मंगलवार को:

पारण समय: सुबह 6:02 बजे से 8:33 बजे तक

पारण का दिन: 8 सितंबर 2026

स्थान: नई दिल्ली

पारण निर्धारित समय में करना शुभ माना जाता है। एकादशी व्रत का पारण द्वादशी तिथि में करना चाहिए। 


अजा एकादशी व्रत का महत्व


अजा एकादशी भगवान विष्णु को समर्पित है। धार्मिक मान्यता के अनुसार इस व्रत को श्रद्धापूर्वक रखने से पापों से मुक्ति, सुख-शांति और भगवान विष्णु की कृपा प्राप्त होती है।

भक्त इस दिन भगवान विष्णु और माता लक्ष्मी की पूजा करते हैं। विष्णु मंत्र का जाप, विष्णु सहस्रनाम का पाठ और एकादशी व्रत कथा का श्रवण विशेष फलदायी माना जाता है।


अजा एकादशी व्रत कथा


प्राचीन समय में राजा हरिश्चंद्र अपनी सत्यनिष्ठा और धर्मपालन के लिए प्रसिद्ध थे। लेकिन एक समय उनके जीवन में अत्यंत कठिन परिस्थितियां आईं। उन्हें अपना राज्य, धन और परिवार तक छोड़ना पड़ा।

राजा हरिश्चंद्र अत्यंत दुखी और परेशान होकर अपने कष्टों से मुक्ति का उपाय खोजने लगे।

इसी दौरान उनकी भेंट गौतम ऋषि से हुई। राजा ने ऋषि को अपनी पूरी परेशानी बताई। गौतम ऋषि ने उन्हें अजा एकादशी का व्रत करने की सलाह दी।

ऋषि ने बताया कि अजा एकादशी का व्रत भगवान विष्णु को प्रसन्न करने वाला है। श्रद्धा और नियमपूर्वक इस व्रत को करने से मनुष्य के पाप नष्ट होते हैं और जीवन के कष्ट दूर होते हैं।

राजा हरिश्चंद्र ने विधिपूर्वक अजा एकादशी का व्रत रखा। भगवान विष्णु की पूजा की, रात्रि में जागरण किया और भगवान का स्मरण किया।

व्रत के प्रभाव और भगवान विष्णु की कृपा से राजा के जीवन के संकट दूर होने लगे। उन्हें अपना राज्य, परिवार और सम्मान वापस प्राप्त हुआ।

इस कथा से यह संदेश मिलता है कि कठिन परिस्थितियों में भी सत्य, धर्म और भगवान के प्रति श्रद्धा नहीं छोड़नी चाहिए। अजा एकादशी का व्रत श्रद्धा और भक्ति से करने का विशेष महत्व बताया गया है।

अजा एकादशी की कथा परंपरागत रूप से राजा हरिश्चंद्र और गौतम ऋषि से जुड़ी है। 


अजा एकादशी पूजा विधि


सुबह जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र पहनें।

पूजा स्थान को साफ करके भगवान विष्णु की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें।

भगवान विष्णु के सामने दीपक जलाएं।

भगवान को पीले फूल, फल और मिठाई अर्पित करें।

तुलसी दल भगवान विष्णु को अर्पित करें।

“ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें।

अजा एकादशी व्रत कथा पढ़ें या सुनें।

भगवान विष्णु की आरती करें।

दिनभर भगवान का स्मरण और भजन करें।


अजा एकादशी में क्या खाएं?


जो भक्त निर्जल व्रत नहीं रखते, वे अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार कर सकते हैं।

एकादशी के फलाहार में सामान्यतः ये चीजें ली जाती हैं:

फल

दूध

दही

मखाना

साबूदाना

सिंघाड़े का आटा

कुट्टू का आटा

राजगीरा

आलू

शकरकंद

मूंगफली

सूखे मेवे

नारियल पानी

व्रत रखने वाले व्यक्ति को अपनी शारीरिक क्षमता और स्वास्थ्य के अनुसार उपवास का प्रकार चुनना चाहिए। 


एकादशी व्रत में क्या नहीं खाना चाहिए?


एकादशी व्रत में सामान्य रूप से अनाज और कई प्रकार की दालों का सेवन नहीं किया जाता।

इनसे बचें:

चावल

गेहूं

आटा

रोटी

दाल

चना

मटर

सामान्य नमक, यदि आपकी परंपरा में सेंधा नमक का नियम है

मांसाहारी भोजन

शराब और अन्य नशीले पदार्थ

एकादशी व्रत में अनाज और अनाज से बने खाद्य पदार्थों का सेवन न करने की परंपरा है। 


अजा एकादशी व्रत के नियम


सुबह स्नान करके व्रत का संकल्प लें।

भगवान विष्णु की पूजा करें।

झूठ और क्रोध से बचें।

किसी का अपमान न करें।

सात्त्विक विचार रखें।

भगवान विष्णु का नाम जपें।

जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन, फल या वस्त्र का दान करें।

अगले दिन निर्धारित समय में पारण करें।


अजा एकादशी पारण कैसे करें?


8 सितंबर 2026 को सुबह स्नान करने के बाद भगवान विष्णु की पूजा करें।

इसके बाद दिल्ली में सुबह 6:02 बजे से 8:33 बजे के बीच व्रत का पारण करें। 


पारण हल्के भोजन या फलाहार से करना अच्छा रहता है। लंबे उपवास के बाद अचानक भारी भोजन करने से बचें।


अजा एकादशी 2026 का संक्षिप्त विवरण

विषय

जानकारी

एकादशी

अजा एकादशी

वर्ष

2026

व्रत की तारीख

7 सितंबर 2026, सोमवार

एकादशी प्रारंभ

6 सितंबर, शाम 7:29 बजे

एकादशी समाप्त

7 सितंबर, शाम 5:03 बजे

पारण की तारीख

8 सितंबर 2026, मंगलवार

दिल्ली पारण समय

सुबह 6:02 से 8:33 बजे

आराध्य देव

भगवान श्री विष्णु

प्रमुख कथा

राजा हरिश्चंद्र और गौतम ऋषि


निष्कर्ष

अजा एकादशी भगवान विष्णु की भक्ति, संयम और आत्मशुद्धि का पर्व है। इस दिन श्रद्धा से व्रत रखकर भगवान विष्णु की पूजा करें, अजा एकादशी की कथा सुनें और अपनी क्षमता के अनुसार दान-पुण्य करें।

दिल्ली में 2026 में अजा एकादशी का व्रत 7 सितंबर को और व्रत का पारण 8 सितंबर को सुबह 6:02 से 8:33 बजे के बीच किया जाएगा।



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..दिवाळी पाडवा.--- दाम्पती जीवनातील आदर, कृतज्ञतेचा संगम


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 आज दिवाळी पाडवा आहे. यालाच बलीप्रतिपदा असेही म्हणतात.
    पौराणिक कथेत प्रतिपदेच्या दिवशी महाप्रतापी आणि दानशूर राजा बळी यावर विजय प्राप्त करुन विष्णू जेव्हा वैकुंठात गेले तेव्हा लक्ष्मीने त्यांचे औक्षण करुन स्वागत केले.तसेच याच दिवशी पार्वतीने शंकराला द्युत या खेळात हरविले. म्हणून या दिवसाला द्युत पाडवा असेही म्हणतात
असा उल्लेख आहे.


         *बदलत्या काळात जुन्या प्रथा परंपरांचा नव्याने  अन्वयार्थ समजून घेतला तर आपल्या प्रत्येक पंरपरेत - रुढीत एक कौटुंबिक व सामाजिक आनंद निर्मिती
दडली आहे असे आपल्याला नक्कीच वाटेल.


       दिवाळी पाडव्याचा  जो संदर्भ दिला आहे त्याकडे आपण जरा वेगळ्या दृष्टिकोनातून पाहिले तर आपणास  लक्षात येईल की पती पत्नीच्या एकमेकां विषयींच्या आदर भावना व्यक्त करण्यासाठी या प्रथा होत्या.


   विजयी होवून येणाऱ्या पती विष्णूला त्याची पत्नी आदराने ओवाळते, त्याचा आदर सन्मान करते आणि विष्णू प्रसन्न होवून पत्नीला महालक्ष्मी संबोधतो, ही परंपरा आजच्या धकाकीच्या जीवनात पती-पत्नीतील आदर आणि परस्परांवरी विश्वास व्यक्त करण्यास पुरेशी आहे.


 सहजीवनास प्रारंभ करताना दाम्पत्य एकमेकासाठी अनोळखी असतात. सहजीवन विस्तारते तसे एकमेकांना ते ओळखू लागतात. ओळखीतून विश्वास निर्माण होतो. विश्वास हा परस्परांवरील प्रेमात रुपांतरीत होतो. विश्वासाची अंतिम अवस्था परस्परांवरील आदरात असते. पती-पत्नीतील सुखाची किंवा समर्पणाची समाधिस्थ अवस्था ही परस्पराप्रति आदराची असते. हा आदर सहजीवनाच्या प्रारंभी कधीच नसतो. तेव्हा असते केवळ आकर्षण आणि शरीराचे समर्पण.


      दिवाळी पाडव्याला पत्नी विश्वास आणि आदराने पतीला ओवाळते. आयुष्यातील लहान मोठ्या अडचणी किंवा समस्यांवर विजय मिळविल्याचा त्यात आनंद असतो. अशी पत्नी लक्ष्मी रुपात असते. कधीकधी पत्नी सुध्दा पती सोबत नियतीच्या संघर्षावर मात करते. अशी पत्नी पार्वती रुपात असते. म्हणूनच दिवाळीच्या पाडव्याला परस्परांप्रति असलेला आदर व्यक्त करण्यासाठी औक्षणाची करण्याची प्रथा अस्तित्वात आली.


    दिवाळी पाडव्याच्या औक्षणानंतर पती-पत्नीस सस्नेह भेट देतो. अशी भेट देणे म्हणजे नात्यांची गुंफण अधिक घट्ट करणे होय. दिवाळी पाडव्याचा हा भावार्थ दाम्पती जीवनाला प्रगल्भ व समृध्द करणारा आहे असे मला वाटते.


सर्व मित्र परिवार व हितचिंतकांना दिवाळी पाडव्याच्या मनःपूर्वक  शुभेच्छा !!

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